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Pustakalaya Ka Mahatva Essay Definition

पुस्तकालय का महत्व

Pustakalya Ka Mahatav

निबंध नंबर :01 

सृष्टि के समस्त चराचरों में मनुश्य ही सर्वोत्कृष्ट कहलाने का गौरव प्राप्त करता है। मनुष्य ही चिंतन-मनन कर सकता है। अच्छे-बुरे का निर्णय कर सकता है तथा अपने छोटे से जीवन में बहुत कुछ सीखना चाहता है। उसी जिज्ञासावृत पुस्तकें शंात करती है अर्थात ज्ञान का भंडार पुस्तकों में समाहित है।

ऐसा स्थान जहां अनेक पुस्तरों को संगृहीत करके उनका एक विशाल भंडार बनाया जाता है। पुस्तकालय कहलाता है। पुस्तकालय ज्ञान के वे मंदिर हैं जो मानव इच्छा को शांत करते हैं, उसे विभिन्न विषयों पर नई जानकारियां उपलब्ध करते हैं, ज्ञान के संचित कोश से उसे निश्चित करते हैं। अतीत झरोखों की झलक दिखाते हैं तथा उसके बौद्धिक स्तर को उन्नत करते हैं।

दुनियां में विषय अनंत हैं उन विषयों से संबंधित पुस्तकें भी अनंत हैं। उन सभी पुस्तकों को खरीद कर पढ़ पाना किसी के बस की बात नहीं। इस आवश्यकता की पूर्ति पुस्तकालय अत्यंत सुगमता से कर सकता है। बड़े-बड़े पुस्तकालयों में लाखों पुस्तकें संगृहीत होती हैं। इनमें वे दुलर्भ पुस्तकें भी होती हैं जो अब अप्राप्य हैं जिन्हें किसी भी कीमत पर खरीदा नहीं जा सकता।

पुस्तकालय में बैठकर कोई भी व्यक्ति एक ही विषय पर अनेक व्यक्तियों के विचारों से परिचित हो सकता है। अन्य विषयों के साथ अपने विषय का तुलनात्मक अध्ययन भी कर सकता है। अनगिनत पुस्तकों वाले अधिकांश पुस्तकालय पूरी तरह व्यवस्थित होते हैं। विद्यार्थी कछ देर में ही अपनी जरूरत की पुस्तक पा सकता है।

पुस्तकालय में जाते समय उसके नियमों की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। वहां जाकर वही पुस्तकें पढऩी चाहिए जिनकी आपको जरूरत हो। पुस्तकालय में ऐसी अनेक पुस्तकें होती हैं। यदि विद्यार्थी पुस्तकालय में केवल किस्से कहानियों की किताबें पढक़र अपना समय बर्बाद करने के लिए जाते हो तो सदुपयोग करना चाहिए तथा पुस्तालय में बैठकर शांत वातावरण में एकाग्रचित होकर अध्ययन करना चाहिए। पुस्तकालय में बैठकर पुस्तकें पढ़ते समय बिल्कुल शांत रहना चाहिए। पुस्तकालय की पुस्तकों पर पेंसिल या पेन से निशान लगाना, उनके चित्रों आदि को फाडऩा या गंदा करना ठीक नहीं है। वहां बैठकर हमें औरों का भी ध्यान रखना चाहिए। हमें कोई ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों को असुविधा हो। पुस्तकालय किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं इसलिए वहां सगृहीत पुस्तकें सामाजिक संपति होती हैं अत: हमें पुस्तकालय की पुस्तकों को उसी दृष्टि से देखना चाहिए।

पुस्तकालयों में संकलित पुस्तकों के माध्यम से व्यक्ति भाव-विचार, भाषा, ज्ञान-विज्ञान आदि सभी विषयों के क्रमिक विकास का इतिहास जानकार उनका किसी भी विशिष्ट दृश्टि से अध्ययन कर सकता है। अपने प्रिय महापुरुष, राजनेता, कवि, साहित्यकार आदि के जीवन और विचारों से कोई व्यक्ति सहज ही साक्षात्कार संभव हो जाता है। जातियों, राष्ट्रों, धर्मों आदि के उत्थान-पतन का इतिहास भी पुस्तकों से जानकर उत्थान और पतन के कारणों को अपनाया या उनसे बचा जा सकता है।

पुस्तकालय ज्ञान-विज्ञान के अनंत भंडार होते हैं। उन्हें अपने भीतर समाए रहने वाला अनंत नदी-धारों, विचार-रत्नों, भाव-विचार-प्राणियों का अनंत सागर एंव निधि कहा जा सकता है। जैसे ज्ञान-विज्ञान के कई तरह के साधन पाकर भी सागर की अथाह गहराई एंव अछोर स्वरूपाकार को सही रूप से नाप-तोल संभव नहीं हुआ करता, उसी प्रकार पुस्तकालयों में संचित अथाह ज्ञान-विज्ञान, विचारों-भावों आदि को खंगाल पाना भी नितांत असंभव हुआ करता है। जैसे अनंत नदियों का प्रवाह नित्य प्रति सागर में मिलते रहकर उसे भरित बनाए रखता है वैसे ही नित्य नई-नई पुस्तकें भी प्रकाशित होकर पुस्तकालयों को भरा-पूरा किए रहती हैं। यही उनका महत्व एंव गौरव है।

 

पुस्तकालय 

Pustakalya 

निबंध नंबर :-02 

अर्थ- पुस्तकालय शब्द दो शब्दों के योग से मिलकर बना है, पुस्तक ़ आलय। जिसका अर्थ है पुस्तकों का घर। पुस्तकालय अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे -निजी पुस्तकालय, विद्यालय के पुस्तकालय, सार्वजनिक पुस्तकालय आदि।

प्रत्येक पुस्तकालय अपने आप में कुछ नियम बनाकर रखते हैं हमें पुस्तकालय में शान्ति के साथ बैठाकर अध्ययन करना चाहिये। जहां से पुस्तक उठाएं, हमारा कर्तव्य है कि उसे उसी स्थान पर वैसे ही रख दें।

पुस्तकालय का महत्व- पुस्तकालय को ज्ञान की देवी माता सरस्वती का मन्दिर कहा जाता है। सभी विद्यार्थी को चाहें, वह गरीब हो अमीर हो, बच्चा हो बूढ़ा हो नर हो नारी हो उन्हें किसी भेदभाव के पुस्तकालय मंे जाने की अनुमति प्रदान की जाती है, वे स्वइच्छा से कोई भी पुस्तक वहां से लेकर पढ़ सकते हैं।

पुस्तकालय मंे प्रसिद्व लेखकों के उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, मनोरंजन काव्य-संगह तथा विद्यार्थियों के लिए परीक्षोपयोगी पुस्तकें उपलब्ध होती हैं।

समय बिताने का एक आदर्श स्थान- पुस्तकालय में जहां एक तरफ ज्ञान के भण्डार हैं वहीं दूसरी तरफ मनोरंजन के सस्ते और श्रेष्ठ साधन भी उपलब्ध हैं। अवकाश के दिनांे में पुस्तकालय समय बिताने का एक आदर्श स्थान है।

ज्ञान में वृद्धि- पुस्तकालय से हम अपनी आवश्यकता की सभी पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं उनका अध्ययन करके अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं।

उपसंहार- पुस्तकालय के द्वारा हमें अपने देश के महापुरूषों के जीवन चरित्र सम्बन्धित महत्वपूर्ण बातों का पता चलता है। यह है कि उन्होनें देश की रक्षा के लिए क्या-क्या कार्य किये और किस प्रकार अपने प्राणों का बलिदान किया। उनकी जीवनियों को पढ़कर हमें उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती है। परन्तु आज के जमाने में देश मे पुस्तकालयों व पुस्तकों की बहुत कमी है, जिस कारण हमें सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। हमारी सरकार को भारत में पुस्तकालयों के विकास के लिए अधिक प्रयत्न किया जाना चाहिये।

June 13, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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Short Essay on 'Library' in Hindi | 'Pustakalaya' par Nibandh (225 Words)

Short Essay on 'Library' in Hindi | 'Pustakalaya' par Nibandh (225 Words)
पुस्तकालय

पुस्तकालय का अर्थ है- पुस्तक+आलय अर्थात पुस्तकें रखने का स्थान। पुस्तकालय मौन अध्ययन का स्थान है जहाँ हम बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं।

पुस्तकालय भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। कई विद्या-प्रेमी अपने उपयोग के लिए अपने घर पर ही पुस्तकालय की स्थापना कर लेते हैं। ऐसे पुस्तकालय 'व्यक्तिगत पुस्तकालय' कहलाते हैं। सार्वजनिक उपयोगिता की दृष्टि से इनका महत्त्व कम होता है।

दूसरे प्रकार के पुस्तकालय स्कूलों और कॉलेजों में होते हैं। इनमें बहुधा उन पुस्तकों का संग्रह होता है, जो पाठ्य-विषयों से संबंधित होती हैं। सार्वजनिक उपयोग में इस प्रकार के पुस्तकालय भी नहीं आते। इनका उपयोग छात्र और अध्यापक ही करते हैं। परन्तु ज्ञानार्जन और शिक्षा की पूर्णता में इनका सार्वजनिक महत्त्व है। इनके बिना विद्यालयों की कल्पना नहीं की जा सकती।

तीसरे प्रकार के पुस्तकालय 'राष्ट्रीय पुस्तकालय' कहलाते हैं। आर्थिक दृष्टि से संपन्न होने के कारण इन पुस्तकालयों में देश-विदेश में छपी भाषाओं और विषयों की पुस्तकों का विशाल संग्रह होता है। इनका उपयोग भी बड़े-बड़े विद्वानो द्वारा होता है। चौथे प्रकार के पुस्तकालय सार्वजनिक होते हैं। इनका संचालन सार्वजनिक संस्थाओं के द्वारा होता है।

पुस्तकालयों के अनेक लाभ हैं। सभी पुस्तकों को खरीदना हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। इसके लिए लोग पुस्तकालय का सहारा लेते हैं। इन पुस्तकालयों से निर्धन व्यक्ति भी लाभ उठा सकता है। पुस्तकालय से हम अपनी रूचि के अनुसार विभिन्न पुस्तकें प्राप्त कर अपना ज्ञानार्जन कर सकते हैं।

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